Differences

जो बिन कहे सब समझ जाती थी,
वो आज सुन कर भी मेहसूस नही कर पाती मेरी इच्छाएं।
वक्त तो बदलता रहता है,
उसका चलन है बदलना,
लेकिन उसका बदल जाना,
वक्त की साज़िश नही लगता।

आज वक्त में पीछे देखता हूं तो
बेइंतहा प्यार नज़र आता है,
और आगे देखता हूं तो,
उसका प्यार और ना वो,
दोनो ही नजर नहीं आते।

आज घंटो सोचता हूं की उसके बिना जिंदगी कैसी होगी,
उससे मुलाक़ात के बाद कभी सोचा ही नही उसके बिना जीना।

आज सोचने पे मजबूर हूं,
बहुत खौफ जदा, कमजोर हूं,
जो था हमरे दरमियां,
उस रिश्ते का कोई छोर हूं,
बिखर गया हूं,
उजड़ गया हूं,
जो था नही वो बन गया हूं।

© Reyaansh Chaudhary

Chidiya

एक चिड़िया थी,दूर एक घरौंदे में

दूर एक घरौंदे में

उदास और न खुश दिखा करती थी,

फिर एक रोज हम मिले,

थोड़ी बातें हुई,

कुछ मुलाकातें हुई,

लेकिन हमेशा ही वो डरी, सहमी,

ना उम्मीद दिखती थी,

जबसे उसे देखा था,

दिल में अजीब सी चुबन थी, बेचैनी थी,

की किसी तरह वो खुश रहे,

उम्मीदों से भरी रहे,

आसमा में उड़ने की चाहत हो उसे,

ना अपने घोंसले लौट के आने की फिक्र हो,

ना ही गिरने का डर हो,

धीरे धीरे हमारी मुलाकातों ने उसे हौसला दिया,

उसने अपने घरौंदे से हर मुश्किल पार कर,

थोड़ा थोड़ा उड़ना सीखा,

जब जब उड़ने निकलती,

मेरे घरौंदे जरुर आती थी,

मेरे घोंसले में बैठ, घंटो चहचाहती थी,

मुस्कुराती थी, खिलखिलाती थी,

कभी वे वजह ही उदास हो जाती थी,

मेरे घिसले से उड़ अपने घरौंदे लौटने का खयाल,

उसे उदास कर देता था,

वक्त बिता, मौसम बीते, बीते कुछ साल,

उस चिड़ियां को,

मेरे घरौंदे, और मुझसे,

मोहब्बत होने लगी थी,

वो इस घोंसले को अपना घर,

और मुझे अपना हमसफ़र समझने लगी थी,

उसकी खुशी, उसके होसले देख,

उसकी मासूमियत, उसकी खामियों में,

मैं बहुत खुश था,

वो अपने घोंसले से,

इस घोंसले आती,

नाचती, गाती, आस्मां में घंटो गोते लगाती,

मैं उसे ये खुला आसमां दे के बहुत खुश था,

उसे उड़ते देख, उस पे निगरानी रखता था,

की, वो गिरे ना, धूप में जले ना,

वो हमेशा ही थोड़ी दूर उड़ के लौट आती थी,

इस घोंसले जहा उसे सुकून और आज़ादी मिलती थी,

वक्त बिता, उस चिड़िया की उड़ान ऊंची होती चली गई,

उसके पंख उसे इस घोंसले से, मेरी निगाह से,

धीरे धीरे दूर ले जा रहे थे,

उसके पंख, उसकी उड़ान और उसके हौसले,

पहले से बहुत बड़े हो चुके थे,

आज उसे न गिरने का डर था,

ना ही अपने घोंसले लौट जाने का खौफ था,

वो पूरा आसमां नापने के लिए बेताब थी,

बहुत दफा मुझे आवाज भी दी,

की मैं भी साथ उडू, उसके साथ,

लेकिन, मैं मजबूर था,

मेरे साथ मेरे अपने घरौंदे की जिम्मेदारी भी थी,

और चिड़िया के आसमां पर नज़र भी रखनी थी,

क्यों की, आसमां जैसे जैसे बड़ा होता जायेगा,

हवा का बोझ उसके पंखों पे बढ़ने लगेगा,

वो किस वक्त थक जाए,

या किस वक्त इस घोंसले लौट आए नहीं जानता था,

मेरा उसके साथ ना उड़ने की वजह

मेरी जिम्मेदारी, और चिड़िया के घरौंदे के किरदारों से,

मेरे घरौंदे की देख भाल करना,

और चिड़िया के आसमां में,

उन्हें चिड़िया से दूर रखना भी था,

धीरे धीरे चिड़िया आसमां नापते नापते

बहुत दूर निकल गई,

मेरे घोंसले, जिसे वो अपना घरौंदा समझती थी,

वक्त के साथ वो आसमां में ओझल हो गई,

मैं उसके लौटने का इंतजार करता रहा,

और वो मेरा, मेरे घोसले से उड़,

उसके साथ उड़ने का,

हम दोनों ही इंतजार में रहे,

मैं घोंसले में राह देखता रह गया,

वो आसमां में,

कुछ शिकायतें उसे हो गई,

कुछ मुझे भी थी,

जो आसमां उसे देना चाहा,

वही हमारी दूरी बन गया,

कोन गलत है,

कोन सही हम नहीं जानते,

चिड़िया और इस घरौंदे को समझना

बहुत मुश्किल है,

सब लिख पाना बहुत मुश्किल है।

एहसास

देखो कहां ले आए तुम

अंधेरों, मुश्किलों, दुखों से दूर

उलझनों से सुलझन की ओर ले आए तुम

बे – सुकून से सुकून कि तरफ़

गुमनामी से वजूद की ओर ले आए तुम

मरे हुए से ज़िंदा होने का

एहसास करा दिया तुमने

अधूरे से पूरा कर दिया तुमने

सवालों को जवाब में बदल दिया

समर्पण को आत्मसमर्पण कर दिया तुमने

एक कैदी को चिड़िया बना कर

आज़ाद करा दिया तुमने

हां उड़ना सिखा दिया तुमने ।

Bachpan

बच्चा सोचता है, बड़ा हो जाऊँ
अपने पैरों पर, खड़ा हो जाऊँ
अपने कदमों से, दुनिया नापूंगा
तवारीख़ में, अपना नाम छापूंगा
बचपन का एक ख़्वाब लिए ज़िन्दा
मैं नासमझ, नादान सा परिंदा ।

नित नए ख़्वाब बुनता है
आधी-अधूरी राह चुनता है
मान बैठता है, सब सच
जिससे, जैसी, बात सुनता है
बचपन का एक ख़्वाब लिए ज़िन्दा
मैं नासमझ, नादान सा परिंदा ।

और आड़े आ ही जाती है हक़ीक़त
जैसे, अनजानी सी कोई मुसीबत
लड़खड़ाता है, मगर खड़ा हो जाता है
एक रोज़, हर बच्चा बड़ा हो जाता है
बचपन का एक ख़्वाब लिए ज़िन्दा
मैं नासमझ, नादान सा परिंदा ।

तारीखें मरती नहीं

कुछ तारीख़ें मरती नहीं
बस पड़ी रहती हैं
कैलेंडर के किसी कोने में
दीवार से टेक लगाए
बिल्कुल अधमरी स्थिति में…
ना कोई हलचल,
ना ही संचार,
बस साँसें मात्र ही चलती हैं!
टूट टूट कर आती
इन साँसों के सहारे ही
हर साल ये तारीखें
खड़ी हो जाती हैं…
काँपते पैरों से,
लड़खड़ाते हुए
चली आती हैं सामने
तय समय पर
ले कर अपने साथ
कुछ दफ़न यादें..
जिन्हें बाहर देख कब्र के
कोसा जाता है इन तारीख़ों को.
ये तारीखें फिर लेकर बद्दुआएँ
लौट जाती है
कैलेंडर के उसी कोने में..
जहाँ बेबस आँखों से
देखती रहती हैं एकटक
दरवाज़े की तरफ़
एक आस लिए…
कि, किसी रोज़ उन्हें फिर से
सराहा जाएगा
पहले की तरह…
और यही उम्मीद,
यही कमबख़्त उम्मीद…
इन तारीख़ों को मरने तक नहीं देती!

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